
लेखक: अहमद अली
“मेरा भी स्वागत क़बूल फ़रमा,
पर आओ पहले
तुझे इस दौर के हालात से
रू-ब-रू कराएँ।”
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
स्वागत है, स्वागत नया साल
आ देख ज़रा लोगों का हाल
ज़ालिम को है फूलों की सेज
है न्याय यहाँ बेबस, बेहाल
गिरजा लूटा है, देख ज़रा
क्रिसमस भी है बिखरा-बिखरा
सांता क्लॉज़ के आँसू देख
बेख़ौफ़ हैं वो, सत्ता है ढाल
मस्जिद का गुम्बद गिरते देख
मज़हब की आज़ादी घिरते देख
है “प्यार मोहम्मद” पर पहरा
फ़रमान है ये, न कर मजाल
बेशर्म सदाएँ सुन तो ज़रा
मासूम है ‘सेंगर’, सुन तो ज़रा
उनके घर में क्या बेटी है?
आ, पूछें हम उनसे सवाल
ऐ दोस्त मेरे, कुछ तो मानो
उन्नाव हो या बिल्किस बानो
ख़तरे से बाहर कौन यहाँ
हर साल यहाँ है, नया काल
कोई तो दे इसका जवाब
घूँघट हो या कि हो हिजाब
रहबर ही जब ख़ुद आफ़त हो
फिर कौन करेगा देखभाल
जज़्बा हो जो कुछ करने का
ज़ुल्म और सितम से लड़ने का
बाँधो मुट्ठी, तानो सीना
आँखों में उतारो लहू लाल
मेहमान मेरे, तू भी कुछ कर
जो हाथ बेचारा है सिर पर
उन हाथों को परचम दे दो
फिर नए वर्ष का देख कमाल
स्वागत है, स्वागत नया साल


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