राष्ट्रनायक न्यूज

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‘टी’ शब्द गायब होने का अर्थ

राष्ट्रनायक न्यूज।
यद्यपि अमेरिका ने काबुल एयरपोर्ट पर हुए बम धमाकों में अपने 13 सैनिकों की मौत का बदला ले लिया हो, उसने नागरहार प्रांत में आईएस-के के ठिकानों पर ड्रोन हमला कर आईएम-के के दो सदस्यों के मरे जाने का दावा किया है लेकिन यह वास्तविकता है कि अमेरिका तालिबान के आगे घुटने टेक चुका है। रविवार की शाम काबुल एयरपोर्ट पर हुए बड़े धमाके से यह साबित हो चुका है कि आईएस-के की मौजूदगी काफी शक्तिशाली है। यह भी वास्तविकता है कि संयुक्त राष्ट्र अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अब तालिबान जैसे दुर्दांत आतंकवादियों के प्रति भी नरम रुख अपना रही है।

अफगानिस्तान में जो कुछ हो रहा है उसकी तुलना वियतनाम में अमेरिका की हार से करें या 1959 की क्यूबा क्रांति से करें या फिर ईरान की इस्लामी क्रांति से करें, भले ही चीन और पाकिस्तान अमेरिका की हार पर जश्न मनाएं लेकिन गम्भीरता से विचार करें तो चुनौती पूरे विश्व के लिए है। तालिबान का अफगानिस्तान पर कब्जा होना अपने आप में खतरनाक है, साथ ही अब बड़ा खतरा इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) का है। इराक और सीरिया में इस्लामिक स्टेट को लगभग खत्म कर दिया गया था, इसमें अमेरिका के साथ-साथ रूस ने बड़ी भूमिका निभाई थी। यह मान लिया गया था कि दुनिया को आईएस से मुक्ति मिल गई है लेकिन तालिबान की ताकत बढ़ने के साथ ही आईएस भी मजबूत होने लगा। अब यह साफ हो चुका है कि आईएस को इराक और सीरिया में भी ताकत मिलेगी। जैसे हालात बन रहे हैं उससे लगता है कि आईएस और तालिबान के बीच जंग छिड़ जाए। गृह युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान और चीन को कुछ हासिल नहीं होने वाला। अफगानिस्तान में आईएस का एक अलग गुट काम करता है, जो इस्लामिक स्टेट खुरासान यानी आईएस-के के नाम से जाना जाता है। अरब और मुस्लिम इतिहास में खुरासान का बहुत महत्व है। इसकी सीमाएं ईरान से लेकर मौजूदा समय के ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान तक हैं लेकिन बुनियादी रूप से पुराने खुरासान में मौजूद ईरान का उत्तर पूर्वी हिस्सा, अफगानिस्तान का कुछ हिस्सा, मध्य एशिया का दक्षिणी हिस्सा शामिल थे।

आईएसआईएस की आतंकी गतिविधिओ का हिस्सा सिर्फ इराक और सीरिया थे। उसके बाद बचे हुए बड़े हिस्से में आईएस- के यानी इस्लामिक स्टेट खुरासान काम करता था। आईएस-के का मानना है कि तालिबान ने अमेरिका से हाथ मिला लिया है और इसलिए अमेरिका ने उसे अफगानिस्तान पर कब्जा नहीं करने दिया। उनका यह भी कहना है कि नया तालिबान अमेरिका का प्रोकॅसी है। चीन और दुनिया के दूसरे कई देश जिस तालिबान को बदला हुआ या नया तालिबान बता रहे हैं उसे आईएस-के अमेरिका दुमछल्ला करार दे रहा है। अगर क्रूरता की दृष्टि से देखा जाए तो तालिबान और आईएस-के में कोई अंतर नहीं। आईएस-के तो तालिबान से कहीं अधिक क्रूर है। काबुल के तालिबानी राज में अफगानिस्तान जिहाद की वैश्विक फैक्टरी बनेगा। तरह-तरह के संगठन आतंकी बनाने, उनकी ट्रेनिंग, उनके निर्यात का वह सब काम करेंगे। आईएस-के ने अपना दायरा इतना बढ़ाया हुआ है कि भारत के केरल से 14 युवक इस संगठन के लड़ाके बने हुए हैं। जिस इकलौते बंदूकधारी ने काबुल के गुरुद्वारे में हमला करके 25 लोगों को मार डाला था वह केरल का ही रहने वाला था। इस लिहाज से यह संगठन भारत के लिए भी चिंता का कारण है।

तालिबान या अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद इस संगठन पर वैश्विक राज में कोई तब्दीली आएगी या नहीं यह तो समय ही बताएगा लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक बयान के बाद माना जाने लगा है कि इस संगठन को लेकर अब गम्भीरता बरती जा रही है। यह बयान पहला संकेत है कि तालिबान का अब वैश्विक बहिष्कार नहीं हो सकता। इस बयान का अर्थ यही है कि अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में तालिबान अब काफी समय तक अलग-थलग नहीं पड़ने वाला। सुरक्षा परिषद ने अपने पहले के बयान में तब्दीली करते हुए एक पैराग्राफ में संदर्भ के तौर पर ‘तालिबान’ शब्द हटा लिया गया। बयान में कहा गया है कि ‘‘सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने अफगानिस्तान में आतंकवाद का मुकाबला करने के महत्व को दोहराया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अफगानिस्तान के क्षेत्र का इस्तेमाल किसी भी देश को धमकी देने या हमला करने के लिए न हो और किसी भी अफगान समूह या व्यक्ति को किसी भी देश के क्षेत्र में सक्रिय आतंकवादियों का समर्थन नहीं करना चाहिए। इससे तालिबान का कहीं कोई जिक्र नहीं। भारत ने ही यह गलती पकड़ी है। भारत के लिए स्थिति बड़ी जटिल है। तालिबान ने भारत से दूतावास बनाए रखने का आग्रह किया था, यह एक अच्छा संकेत है। जब अमेरिका, चीन, पाकिस्तान और रूस तालिबान से बातचीत कर रहे हैं तो भारत जैसी बड़ी राजनीतिक और सैन्य शक्ति किनारे कैसे बैठी रहे।

कूटनीति की मांग है कि संवाद के रास्ते खुले रहें, भरोसा बहाल हो और तालिबान के साथ सीधे सम्पर्क से सहयोग से क्षेत्रों की पहचान हो। भारत अगर ऐसा नहीं करता तो अफगानिस्तान पूरी तरह पाकिस्तान और चीन की गोद में बैठ सकता है। बातचीत में भारतीय हितों को सुरक्षित किया जाना चाहिए और यह स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि तालिबान भारत विरोधी किसी गतिविधि का समर्थन नहीं करेगा। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि भारत का करोड़ों का निवेश कैसे बचेगा। यहां तक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बयान का संबंध है इसने कभी भी एशिया के हितों के अनुरूप काम नहीं किया। संयुक्त राष्ट्र के बयान पर कई लोगों ने अपनी राय रखी है। कूटनीति में एक पखवाड़ा काफी लम्बा समय होता है। ‘टी’ शब्द गायब है तो इसका अर्थ ढूंढना ही होगा। भारत की अध्यक्षता वाली 1988 तालिबान प्रतिबंध समिति में क्या होता है, यह देखना अभी महत्वपूर्ण है।