लेखक- अहमद अली
सच पूछा जाए तो भीमराव रामजी अम्बेडकर का जीवन संघर्षों की एक अनवरत, प्रज्वलित गाथा है—ऐसी गाथा जिसमें पीड़ा है, प्रतिरोध है, और सबसे बढ़कर अदम्य आत्मसम्मान है।
मासूम बचपन से ही अपमान का विष पीना पड़ा।कक्षा में सबसे पीछे बैठने की मजबूरी, घड़े से पानी छूने तक की मनाही। यदि चपरासी आया तो प्यास बुझी, अन्यथा प्यास ही साथ लेकर घर लौटना पड़ा। सोचिए, एक बालक के भीतर कितनी आग, कितना मौन विद्रोह पल रहा होगा!
उच्च शिक्षा की राह भी आसान नहीं थी—आर्थिक तंगी दीवार बनकर खड़ी थी। तभी गायकवाड़ महाराजा ने सहारा दिया। पर विडंबना देखिए, उन्हीं के राज्य में जब वे सैन्य सचिव बने, तब भी जातिगत तिरस्कार ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। अंततः स्वाभिमान ने नौकरी से बड़ा रूप लिया—और उन्होंने पद छोड़ दिया।
समय आगे बढ़ा, वे प्रोफेसर बने, 32 डिग्रियों के स्वामी बने—पर समाज की संकीर्णता का का प्रहार का यहाँ भी सामना हुआ। छुआछूत जहर असर इतना कि कि कोई उन्हें रहने को कमरा तक देने को तैयार नहीं था। ज्ञान और शिक्षा का शिखर भी उस सामाजिक अंधकार को भेद नहीं पा रहा था।
लेकिन वे रुके नहीं, झुके नहीं। संघर्ष को उन्होंने दिशा दी। शिक्षा के बाद उन्होंने दलित-शोषित समाज को संगठित करने का बीड़ा उठाया। “मूक नायक” अखबार शुरू किया—आवाज़हीनों की आवाज़ बनने का प्रयास किया। आर्थिक अभाव के कारण वह बंद हुआ, पर उनकी लड़ाई नहीं बन्द नहीं हुई।
वायसराय की मंत्रिपरिषद में श्रमिकों के अधिकारों के लिए, और नेहरू मंत्रिमंडल में महिलाओं के सम्मान के लिए उन्होंने निर्भीक संघर्ष किया। विरोध हर तरफ से मिला—चाहे संघ का हो या कांग्रेस का—पर उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। कानून मंत्री पद तक को त्यागना पड़ा, पर वे अडिग रहे।
1932 में पृथक निर्वाचक मंडल के लिए संघर्ष, महाराष्ट्र में पानी के अधिकार हेतु महाड़ सत्याग्रह, कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन—हर मोर्चे पर वे अन्याय के विरुद्ध खड़े दिखते हैं। मनुस्मृति के खिलाफ उनका प्रतिरोध केवल विचार नहीं, क्रांति था।
और अंततः, अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने अपने उस ऐतिहासिक कथन—“मैं हिन्दू धर्म में पैदा तो हुआ हूँ, पर इस धर्म में मरूँगा नहीं”—को 22 प्रतिज्ञाओं के साथ साकार किया। यह केवल धर्म परिवर्तन नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान की उद्घोषणा थी।
ऐसे महामानव के जीवन को शब्दों में बाँधना आसान नहीं। जितना लिखिए, उतना कम लगता है; जितना सोचिए, उतना और गहराता जाता है।
सच ही कहा गया है— बाबा साहेब का जीवन संघर्षों का एक अथाह समंदर है।
“बहुत मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा…” –


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