रामायण सर्किट में योजना में सारण का क्षेत्र भी शामिल हो
- कई स्थान मौजूद जहा आये थे भगवान
- भगवान के छह बार परे चरण जहाँ तब क्षेत्र का नामकरण हुआ छपरा
- घमंड दूर करने के लिये भगवान भी आये थे सारण में
अनुज प्रतिक । राष्ट्रनायक प्रतिनिधि।
छपरा (सारण)। जिले में कई ऐसे स्थान विख्याय है युगों युगों से ऐतिहासिक उदाहरण के लिये जाना जाता है।स्वंय भगवान ने भी सारण की धरती पर विचरण ही अवतार भी लिये है चाहे वह सबसे बड़े शिष्य अर्जुन की अभिमान नाश के कारण हो या देवर्षि नारद की मोह भंग के काल खंड हो। यानी सारण की यह धरती अपने आप मे धर्म से जुड़े कई इतिहास को समेटे हुए है।सरकार ने बाद के काल खंड के धर्म प्रवर्तकों जैसे तीर्थंकरों महाबीर एव भगवान बुद्ध के जन्म से महाप्रयाण तक के स्थलों को बाजाब्ता सूचीबद्ध कर पर्यटन एव धार्मिक महत्व को प्रकाशित करने का प्रयत्न करती है मगर विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता एवं धार्मिक मान्यता सनातन धर्म के कथाओं को में चर्चित स्थानों की सूची ही बना पाई है और नही उसे पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने के प्रयास करती है ।
सनातन धर्म से जुड़े अनेक पौराणिक कथाओं का प्रमाण सहित जिक्र एव उस कथाओं से जुड़े स्थलों की इस जिले में भरमार है।
हम सारण के पश्चमी छोर से इस कथाओं की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास कर रहे है जितनी मुझे जानकारी या लोगो द्वारा हमे ज्ञात हुआ है। इन कथाओं में जब हम त्रेता युग के पूर्व की बात करते है तो हमे यह ज्ञात होता है को हमारे धर्म गर्न्थो में चर्चित रामायण और रामचरित मानस के काव्य ओर उस काव्य के नायक एव दसा अवतार में स्थापित भगवान मर्यादा पुरषोतम श्री राम के जन्म एव रावण बध में हनुमान के सहयोग के लिये श्राप ओर इसकी कथा का स्थान सारण में ही मिलता है। सबसे पहले हम युगों के हिसाब से अगर क्रमबद्ध चर्चा करते है तो प्रथम कथा देवर्षि नारद की मोह भंग से प्रारम्भ होता है।जिसमे श्री हरि विष्णु द्वारा देवर्षि नारद के अभिमान भंग करने हेतु एक विश्व मोहिनी नगर का निर्माण किया गया था जिस नगर में विश्व की सबसे सुंदर कन्या के रूप में स्वयं माता लक्ष्मी ने अवतार लिया था और उस राज्य के राजा के रूप में सीलनिधि राजा का जन्म हुआ था। जिस कथा के अंत मे नारद जी को स्वयंबर में स्वयं की बन्दर के मुख के होने की बात देवर्षि नारद को पता चला था और उन्होंने उसी वक्त त्रेता युग मे श्री हरि विष्णु के मानव रूप में अवतार लेने और उस वक्त बंदरो की सहायता का श्राप दिए थे। वही नगर आज जिले के मानचित्र पर मढ़ौरा के नाम से है और आज भी नारद जी के मोह भंग ओर उस कुआ की उपलब्धता है। वही दूसरी कथा सत युग द्वापर ओर अन्य युगों के पहले की है जब देव् असुर संग्राम में स्वयं भगवान म्हश्री दधीचि की हड्डी प्राप्त करके देवासुर संग्राम को जीता था जो जगह कालांतर में दहियावा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मर्यादा पुरषोतम श्री राम ने माता अहिल्या का उद्धार किए थे। माता सती का दहन हुआ था यज्ञ के विध्वंस के बाद राजा दक्ष को भगवान शिव ने उनके अभिमान को तोड़ते हुए उन्हें दंड दिए थे और आज भी वहाँ बाबा गुप्तेस्वर नाथ मंदिर अवस्थित है। श्री कृष्ण के अनन्य भक्त एव उनके शिष्य अर्जुन को जब इस बात का अभिमान हो चला कि इस दुनिया मे श्री कृष्ण का उनसे बड़ा कोई भक्त नही है तो उनके अभिमान को भंग करने हेतु श्री कृष्ण ने चिरान के उस समय के सबसे प्रतापी राजा और महादानी राजा मोर्यध्वज के द्वारा भोजन हेतु उनके पुत्र की मांग करके ओर उनके द्वारा पुत्र का दान लेकर् उस अभिमान को भी तोड़ दिए थे। वही इसके अलावे आमी अम्बिका भवानी बाबा हरिहर नाथ मंदिर सोनपुर जर भरत आश्रम गोदना सेवरिया भगवान हनुमान के ननिहाल समेत कई अन्य स्थल जो हमारे सनातन धर्म के कथाओं से प्रचलित है उनके सरक्षण एव विकास पर सरकार का कोई ध्यान नही है। वही हमारे कलम कार मित्रो द्वारा भी खास प्रयास नही किया जा रहा है। मेरा यह व्यक्तिगत विचार है कि इन सभी क्षेत्रों के कथाओं ओर उससे जुड़े वस्तुओं का संग्रह करके एक सनातन धर्म मे सारण का इतिहास या कुछ और शिर्षक पर एक पुस्तक को लिखा जाय। ओर हम इन जगहों की संख्या अगर जोड़े तो हमारे जिले के नाम छपरा का शाब्दिक अर्थ समझ मे आता है कि छपरा यानी जहाँ भगवान के चरण 6 बार पड़ा।


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