विश्व पत्रकारिता दिवस पर विशेष: कलम को कलम कर दी कातिलों ने….

” कलम को कलम कर दी कातिलों ने फिर भी कलम की पैनी धार हूँ मैं ।
न कोई वसीला है विरासत है मगर यारों,
वाक्पति नृप भोजराज की तलवार व असयार हूँ मैं ।
नहीं मैं बेंच खायी है पुरखों की नेमतों को,
वही खुद्दारियत है नस नस में
राणा परमार हूँ मैं ।”
बहरहाल, विश्व पत्रकारिता दिवस पर विशेष के तहत मैं अतीत और वर्तमान के साथ उज्जवलि भविष्य की कामना कैसे करूँ? आज तो कलम कुर्सियों को कोर्निश बजा रही है।
सच तो यह है कि मैं जिस कलम की बातें कर रहा हूँ उसकी अमनी व इंकलाबी अहमियत व कलमकारों की शख्सियत की कोई शानी नहीं रही है। हलाकू, चंगेज़, दुर्रानी ने भी कलम की धार को देखा था । इतिहास गवाह है कि कलम ने साहित्य, इतिहास ही क्यों भूगोल का सृजन किया है। कलम के प्रकाश में किसी भी राज्य-राष्ट्र की सभ्यता एवं संस्कृति आलोकित, संरक्षित व सुरक्षित होती है। जिस कलम ने महाराणा प्रताप को अकबर शाही ‘दीवान’ होने से बचाया, उनके वंशज राणा फतेह सिंह को ‘हिन्दुआ कुल सूर्य’ से ‘सितारे-हिंद’ होने से बचाया, शिवाजी व छत्रसाल को साम्प्रदायिक ‘निजामे-मुस्तफा’ को उखाड़ फेंकने के लिए जगाया और 1962 में ‘चौवालिस करोड़ भारतीयों को ‘ हिमालय की पुकार’ सुनाया आज कलम झुकने लगी है, कुर्सियों के सामने। राष्ट्रीय स्तर पर रवीश कुमार से लेकर तहसील व ब्लाॅक स्तर पर स्वयंभू पत्रकार कुछ तो बिक चुके हैं तो कुछ क्रेता नेताओं व मीडिया हाउस से बिकने की प्रतीक्षा में हैं।
शायद यह भूल ही गए कि जब कलम जब किसी हुक्मरान व हुक्कामों के तलवे खुजलाने लगा है तो देश तबाह, बर्बाद व गुलाम हुआ है।
भारतीय इतिहास का राजपूत काल या हिंदी साहित्य का वीर गाथा काल उदाहरण है कि चारणों व भाँटो की ‘वीरदावली’में मस्त राजागण एक एक कर देखते देखते लड़ते लड़ते कटे हुए वृक्ष की तरह बँट कर धाराशायी हो गए । साका व जौहर भी नहीं बचा सकता राज्य-राष्ट्र को। मुगल काल भी चारण काल का ‘चर्वितचर्वण’ रहा ‘ दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो’। आर्ष ग्रंथों की मूल भावनाएँ तिरोहित हो गईं, अथर्ववेद में ‘अल्लहोस्रोत’ अल्लहोपनिषद’,बाल्मीकि ‘रामायण ‘ में ‘शंभुक बध’ मनु स्मृति में ‘ शुद्र उपेक्षा ‘ और तो और ‘भविष्यत् पुराण’ आदि काल से लेकर ब्रितानी काल की भविष्यवाणियाँ शामिल हैं तो फिर कांग्रेस काल, गैर कांग्रेस काल व मोदी काल क्यों नहीं ।बहरहाल, स्पष्ट है कि कलम व कलमकारों की काली करतूतों की ही देन है। कलमकारों ने राष्ट्रपिता और राष्ट्रीय चाचा’ जैसी शब्दावली का सृजन किया । भारतीय गौरव विक्रमादित्य, भोजराजृ, रावल बप्पा,पृथ्वीराज चौहान,महाराणा प्रताप, शिवाजी, वीर छत्रसाल, तो इतिहास में दब गए । अकबर महान, औरंगजेब वली, जिन्ना, शेख अब्दुल्ला सेक्युलर बना गए। हाँ भक्त कवियों में तुलसी, सूर,कबीर, औघड़ेश्वर बाबा कीना राम, कबीर, नानक, रैदास,दादू ,जायसी, कुतुबन, मंझन, उस्मान, दशमेश श्री गुरुदेव गोबिंद सिंह जी महाराज अपवाद रहे हैं।
इस सच्चाई से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कलम पर पाबंदियां जब भी लगी हैं, सल्तनतें तबाह व बर्बाद होकर तवारीख बन गई हैं । दारा शिकोह, सरमद, गुरु तेगबहादुर, गुरु गोविंद सिंह, गुरुपुत्रों फतह सिंह, जोरावर सिंह, बंदा सिंह बैरागी आदि की शहादत ने मुगलिया सल्तनत को शहीद कर दिया । कतिपय शासकों ने तो खुद को ही कलमकारों में शुमार किया । प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर भले ही कैदी बनकर रंगून भेज दिए गए किंतु ‘तख्ते-लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की ‘ असयार पर इंकलाबी सुभाषचंद्र बोस, सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, राजगुरु, राजेन्द्र लाहरी, ठाकुर रौशन सिंह, अशफाक उल्ला खां आदि शुरमाओं की गोलियां कहर बरपाया कर दी। ‘ सर फरोशी की तमन्ना’जब इंकलाबी आवाज बनने लगीं तब प्रेमचंद, अकबर इलाहाबादी, चकबस्त, प्रभृति कलमकारों की कलम पर पाबंदियां भी उन्हें रोक न सकीं । राष्ट्रीय जागरण के बिगुल भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘भारत-दुर्दशा ‘ में फूँकीं उसे राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, दिनकर, निराला, प्रसाद, पंत आदि ने जन जन तक पहुँचाने का काम किया । तो पत्रकार गणेश शंकर, विद्यार्थी, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक,महामना मदनमोहन मालवीय, विष्णु पड़ारकर आदि ने मराठा,प्रताप, अभ्युदय, रणभेरी आदि समाचार पत्रों के माध्यम से विदेशी सत्ता की उखाड़ फेंकने में अहम भूमिका निभाई । राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर ने दरबार फतवे को स्वीकार नहीं की और देश के शिक्षा मंत्री नहीं बने किंतु संदेश आज भी गूंज रहे हैं – ‘ सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ‘ बहरहाल, कलमकार अभाव में भी स्वभाव नहीं बदलता, गुरबत पसंद है। कविवर गोपाल सिंह नेपाली ने कहा –
तुझ-सा लहरों में बहता तो मैं भी महलों में रह लेता ।
ईमान बेंचता चलता तो फिर मैं भी सत्ता गह लेता ।”
वर्तमान में साहित्य सेवी व पत्रकारों पर दरबारी पन हावी है। पत्रकारिता एम्बिशन नहीं प्रोफेशन बन गई है। मीडिया हाउस स्वयं ही संपादक, मुद्रक, प्रकाश बनकर सरकार की सुविधा एं व विज्ञापनों की राशि बटोर रहें हैं । पेड खबरों की भी कमीं नहीं है । महाप्रबंधक के मातहत संपादक, समाचार संपादक, प्रसार प्रबंधक, विज्ञापन प्रबंधक हैं । पत्रकार यूनियन, फेडरेशन,संघ आदि समाचार पत्रों के मालिकों के हित रक्षक हैं, पत्रकारों के नहीं ।अभी पंकज कुलश्रेष्ठ की मौत पर पत्रकारिता जगत सरकार से मुआवजे व आश्रितों लिए नौकरी माँग रहा है किंतु जागरण लिमिटेड से नहीं, सिवान में राजदेव की हत्या के बाद हिन्दुस्तान समाचार पत्र ने मृतक के परिजनों के लिए कुछ किया क्या? हाँ पत्रकारों ने जो बन पड़ा किया ।उप्र में कल्याण शासन में पत्रकारों व छायाकारों पर लाठियां चटकीं। मुलायम सरकार ने हल्ला बोला ।मायावती व कांशीराम ने दैनिक जागरण व अमर उजाला के मालिकों को क्या नहीं कहा? कांशीराम ने तो पिटाई भी करा दी थी। बिहार के सारण जिला में 2014 के दौरान एक बाहुबली नेता से पत्रकार किसी प्रकार बचे । सहित्यकार भी लालू चालिसा, मार्यादा पुरुषोत्तम लालू, नितीश चरित मानस लिखकर सम्मान ले रहें हैं । बेचारा पत्रकार अपनी ही सभा में (2003) चाटुकार, जैसे शब्द सारण में ही सुन चुका है। सिवान से एक स्वयंभू मीडिया हाउस की शिकायत भी सर्व विदित है, रोहित नामक युवक जैसे कितने युवक नौकरी के लिए पैसे देकर आगे पीछे वर्षो से कर रहे हैं ।कुछ अखबार सिर्फ पीडीएफ तक ही सीमित हैं । हाँ न्यूज पोर्टल पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए भगीरथी प्रयास जरूर कर रहा है । किंतु जातिवादी जहर, अवसरवादी राजनीति के प्रभाव कायम है । लालू-शासन के दौरान ‘ हँस’ के संपादक राजेन्द्र यादव को जब राष्ट्रभाषा पुरस्कार मिला तो उन्होंने बड़ी बेबाक टिप्पणी की थी ‘ एक यादव द्वारा यादव सम्मानित हुआ है, साहित्यकार नहीं । सत्ताधारी यादव ने कभी पढ़ा है मेरे साहित्य को।’ उन्होंने यह भी कहा था कि दिल्ली सरकारों ने भी जातिगत आधार पर साहित्यकारों को सम्मानित किया है ।जेपी आन्दोलन में सक्रिय पत्रकार सुरेन्द्र किशोर एक बेबाक स्तंभकार हैं इसलिए राज्य सभा क्या विधान पार्षद भी मनोनीत नहीं हुए । पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी के मीडिया सलाहकार रहे हरिवंश जी आज राज्य सभा के उप सभापति हैं । उसी प्रकार नामचीन कहे जाने वाले कुलदीप नैय्यर, खुशवंत सिंह आदि भी, गीतकार नौशाद आदि भी सत्ता के करीब रहकर सम्मानित होकर उच्च सदन में रहे । शायर मुनव्वर राणा भी मोदी सरकार मे असहिष्णुता महसूस करते रहे ।


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