डाॅ. कफील खाँ: एक विद्रोही फरिश्ता

लेखक:- अहमद अली
बिहार में चमकी बुखार का वह दर्दनाक दौर था। बच्चे लगातार दम तोड़ रहे थे।मुजफ्फरपुर इस बिमारी का हौट स्पौट था। उसी दौर में गेारखपुर निवासी चर्चित शिशु चिकित्सक डॉ. कफील खाँ फरिश्ता बन कर मुजफ्फरपुर अपनी मेडिकल टीम के साथ आये थे और हजारों बच्चों की जान बचाई थी। वो केवल इलाज ही नहीं कर रहे थे, बल्कि सुदूर गाँवों में जाकर इस बीमारी के प्रति लोगों को जागरुक भी कर रहे थे। उनकी संवेदना के लिये इस प्रदेश के गरीबों ने दुआवों से उन्हें नवाजा था। आज वही डा. काफील एक तर्कहीन मुकदमा और एनएसए (NSA) के तहत मथुरा जेल में विगत जनवरी से कैद हैं और योगी सरकार के कहर को झेल रहे हैं।
आईये पहले डाॅ. कफील के व्यक्तित्व को समझें, कि वो न केवल एक संवेदनशील चिकित्सक हैं, बल्कि इस सडी़-गली व्यवस्था के विरुद्ध एक मुखर आवाज भी हैं। बिहार में भी हमने उन्हें सुना था कि कैसे वो यहाँ की मेडिकल इन्तजामिया के विरुद्ध सरकार पर सवाल भी उठा रहे थे। जिसके चलते मासूम बच्चों की जान जा रही थी। उनकी मुखर आवाज और बेबाकी, उन्हें हमेशा मुसीबत में डाल देती है। वो झेलते हैं, लेकिन परिस्थितियों से समझौता और ज्यादतियों के सामने समर्पण करना उनके बस की बात नहीं है।
गोरखपुर का उदाहरण भी हमारी नजरों के सामने है कि कैसे बी.आर.डी. मेडिकल कालेज अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी के चलते वहाँ 60 बच्चों ने दम तोड़ दिया था। लेकिन इसका कसुरवार कफील को ही ठहरा दिया गया। अपनी नाकामी पर पर्दा डालने के लिये योगी सरकार ने उन्हीं को बली का बकरा बना दिया, क्योंकि वो सरकार विफलता और जड़-जड़ मेडिकल व्यवस्था पर लगातार सवाल खडे़ कर रहे थे। फर्जी मुकदमा कर नौकरी से निलम्बित किया गया। वो जुझते रहे और 7 महीनों के बाद जेल से बाहर आये। जाँचोपरान्त वों निर्दोष पाये गये और सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में ही फैसला सुनाया था। तानाशाहों और फासीवादियों की फितरत होती है कि वो अपने आलोचकों को सदा बरबाद होते हुए देखना चाहते हैं। उनकी खामियों को प्रकाश में लाने वाले हमेशा उनकी नजरों की किरकीरि होते हैं, जैसा कि आज अपने देश में हो रहा है। सरकार की जनविरोधी नीतियों और नाक्कारापन पर बोलने वाले धरल्ले से देशद्रोही करार दिये जा रहे हैं। चाहे वों पत्रकार हों, हित्यकार हों, विपक्षी नेता या कलाकार हों, कवि या लेखक कोई भी हो, हर किसी पर उनका कहर बरपा है।
डा० कफील खाँ आज NSA के तहत जेल में कैद हैं। उनपर आरोप है कि उन्होंने 12 दिसम्बर 2019 को अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी में भड़काऊ भाषण दिया। जिससे वहाँ हिंसा हुई। बताते चले कि उस समय CAA, NRC और NPR के विरुद्ध पूरे देश में आन्दोलन चरम पर था।जो कोरोना महामारी के चलते अभी थम गया है। जिस मज़में में कफील ने भाषण दिया था, उसमें योगिन्द्र यादव भी मौजूद थे। जब उन्हें मुकदमें के संबंध में पता चला तो काफी आश्चर्यचकित हो गये और कहा कि डा. कफील ने ऐसी कोई भी बात नहीं कही, जिससे उनपर NSA लगाया जाय। आप भी भाषण के मुख्य अंश जान लिजिये जो आरोप बन गया। “मोटा भाई सबको हिन्दू या मुसलमान बनना सिखा रहे है, लेकिन इन्सान बनना नहीं”। “जबसे आर.एस.एस. अस्तित्व में आया है, उन्हें संविधान पे भरोसा नहीं है। “CAA मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाता है और इसे लागू कर मुसलमानों को परेशान किया जायेगा”। इसके अलावा आर.एस.एस. के विरुद्ध भी उन्होंने कई बाते भी कही थी जो बिल्कुल सत्य है। एफ.आई.आर. में कहा गया है कि कफील ने भाषण देकर शांति भंग करने की कोशिश की। उन पर सिविल लाईंस पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज है। आप भी जरा गौर फरमाईये कि उपरोक्त बातों में क्या कुछ भी ऐसी है, जिसके चलते एन.एस.ए. लगाया जाय ? सच्चाई यह है कि आन्दोलन की रफ्तार से सरकार इतना डर गयी थी कि हताशा में आन्दोलनकारियों की ज़बान पर जबरन ताला लगाना चाह रही थी। आज भी केन्द्र सरकार संविधान रक्षक आंदोलनकारियों पर फर्जी मुकदमा थोप कर, यहाँ तक कि यु.ए.पी.ए. के तहत जेल में बन्द कर रही है। सफूरा जरगर के मामले को पूरे देश ने जाना कि यह सरकार कितनी संवेदनहीन है। आज भी दर्जनों आंदोलनकारी जेलों में बन्द हैं। जिनमें जामिया की छात्राओं की संख्या अच्छी खासी है। जो बाहर हैं उन्हें भी एक-एक कर उनके घरों से उठाया जा रहा है।
काफील खाँ ने जेल में अपनी हत्या की आशंका जताई है। कहते हैं , “मुझे संदेह है कि मेरी हत्या कर उसे खुदकुशी का नाम दे दिया जायेगा। लेकिन आपलोग यकीन न करना। मैं इतना कायर नहीं हूँ कि आत्महत्या कर लूंगा”। यकीनन बात सही भी है, लेकिन बात यह भी सही है कि योगी सरकार उनके पीछे हाथ धो कर पड़ी हुई है। अन्यथा क्या वजह है कि गोरखपुर मेडिकल कालेज में ऑक्सीजन की कमी से 60 बच्चों की मृत्यु संबंधित उन पर जो भी आरोप थे, सभी जाँचोपरान्त निराधार साबित होने के बावजूद, यहाँ तक कि IMA के आग्रह करने के बाद भी यु. पी. सरकार ने उनका निलम्बन वापस नहीं लिया। इतना ही नहीं दूसरा आरोप मढ़ जाँच के आदेश दे कर मामले को लम्बा खींचती रही, फिर संविधान समर्थन आन्दोलन में उनके भाषण को ” हेट ” भाषण की संज्ञा देकर NSA लगा दिया। फलतः अभी जेल में कैद हैं।
ये शुभ संकेत है कि डा. कफील की रिहाई की माँगे समाज के हर वर्ग से मुखर हो रही है। सरकार के कानों पर जूँ कब रेगेंगा यह तो स्पष्ट नहीं है, फिर भी इन्साफ की सदाएँ और तेज हों, समाज के हर तबके को आज सम्मिलित आवाज उठा कर एक नजीर पेश करना चाहिये।
लेखक के अपने विचार है।
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