अजय कुमार सिंह।छपरा
भ्रष्टाचार निवारण हेतु भारतीय संसद द्वारा पारित केंद्रीय कानून है जो सरकारी तंत्र एवं सार्वजानिक क्षेत्र के उपक्रमों में भ्रष्टाचार को कम करने के उद्धेश्य से बनाया गया है।आज भ्रष्टाचार की स्थिति यह है कि व्यक्ति रिश्वत के मामले में पकड़ा जाता है और रिश्वत देकर ही छुट जाता है क्योंकि भ्रष्टाचार व्यवस्था के मूल में है और वह उसका जरूरी हिस्सा है।कोई भी कानून इस व्यवस्था के अंदर ही बनेगा और व्यवस्था खूद भ्रष्टाचार के साथ उस कानून का तालमेल बैठा लेगी।कुछ लोग वर्तमान व्यवस्था से इतने तंग आ गये है कि वे समाधान प्रस्तुत करते है कि यह देश लोकतंत्र के लिए तैयार ही नहीं हुआ था।उनके हिसाब से अगर देश में तानाशाही हो जाए तो सारी व्यवस्था सुधर जाएगी।लोकतंत्र कितना ही बुरा क्यों न हो पर तानाशाही से तो यह लाख गुणा अच्छा है।कुछ यथास्थितिवादी लोग है जो सोचते है कि कुछ नहीं बदलने वाला है।समाज में जैसे भ्रष्टाचार चल रहा है वैसे ही चलता रहेगा।भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए पहले यह समझना होगा कि भ्रष्टाचार क्यों है..? भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए पहली चीज तो यह समझनी है कि भ्रष्टाचार इसी व्यवस्था के मूल में है और व्यवस्था परिवर्तन किये बिना भ्रष्टाचार से मुक्ति संभव नहीं है।जैसा कि पहले बताया गया है पैसा समाज का सबसे बड़ा मूल्य बन गया है।पैसा सबसे बड़ा साध्य भी है।पैसा का दर्शन है पैसा,और इतना पैसा जिसकी कोई सीमा न हो तो सबसे पहले हमें यह सोचना होगा कि पैसे के इस दर्शन को कैसे तोड़ा जाए।
जैसा कि हम जानते है कि व्यक्ति की मूल भूत जरूरतें है – रोटी,कपड़ा,मकान,स्वास्थ्य और शिक्षा।इसके बाद अपना व बच्चों का भविष्य।आज के समय में ये जरूरतें पैसे से ही पूरी होती है और वर्तमान व्यवस्था ने व्यक्ति को उसके हाल पर छोड़ दिया है कि अगर उसमें क्षमता है तो जैसे भी हो सकें,वह खुद पैसा कमाएं और खुद अपनी जरूरतों को पूरा करें।वर्तमान दौर में हर व्यक्ति की अपनी क्षमता के अनुसार पैसा कमाने की एक सीमा है।बिना नियम कानून को तोड़े एक निश्चित सीमा से अधिक पैसा नहीं कमाया जा सकता।एक चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी की तो बात छोड़ दीजिए ; एक आईएएस अधिकारी भी ईमानदारी से काम करें तो जीवन में वह मकान बनवाने,बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाने,अपने परिवार को अच्छी स्वास्थ्य सुविधाए दिलवाने के बाद एक मध्यम वर्गीये परिवार से अधिक की हैसियत नहीं बना सकता।दरअसल राज्य व्यवस्था का यह दायित्व होना चाहिये कि वह अपने नागरिकों के मूलभुत आवश्यकताओं को पूरा करे।स्वास्थ्य व शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी सरकार की होनी चाहिए।देश की सभी नागरिकों के लिए समान शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिये।निजी शिक्षण संस्थानों पर पूरी तरह रोक होनी चाहिए। इसी तरह स्वास्थ्य सुविधाओं से भरपूर अस्पताल सरकार को खोलने चाहिए।सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि क्षमता के अनुसार देश के हर नागरिक को रोजगार उपलब्ध कराये।पूरी प्रशासनिक व्यवस्था,सरकारी मशीनरी न्यायपालिका की जवाबदेही तय हो।पूरे सरकारी तंत्र की जवाबदेही तय किये बिना भ्रष्टाचार को रोकना किसी प्रकार भी संभव नहीं है।जवाबदेही पूरी न होने की स्थिति में दंड का प्रावधान होना चाहिए।
गैर कानूनी तरीके से धन कमाना बड़ा अपराध घोषित किया जाना चाहिए।सरकारी कर्मचारी और व्यवसायी को अपनी सम्पति व आय के स्रोत घोषित करने चाहिए।इस बात का कोई मतलब नहीं है कि अवैध संपति पर टैक्स वसूली कर उसे कानूनी मान्यता दी जाए।अवैध संपति जप्त करनी चाहिए और भविष्य में ऐसा करने पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए।उसके लिए एक टास्क फोर्स का निर्माण करना चाहिए।किसी भी व्यक्ति की संपति के बारे में पूंछने के लिए किसी को भी अनुमति लेने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।टास्क फोर्स को पूछताछ करने का अधिकार होना चाहिए पर इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि वे बिना वजह किसी का भी उत्पीड़न न करें।देश की नागरिकों की भलाई के बारे में सोचने की पूर्ण जिम्मेदारी राज्य व्यवस्था की होनी चाहिए।एनजीओ और ट्रस्ट चलाने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए।दरअसल एनजिओ और ट्रस्ट के नाम पर देश में लूट मची हुई है।जैसा कि हम जानते है कि सबसे अधिक भ्रष्टाचार कॉर्पोरेट जगत में है।दरअसल कारपोरेट का भ्रष्टाचार पूरे समाज के भ्रष्टाचार को प्रभावित करता है।कॉर्पोरेट का भ्रष्टाचार समाप्त करने के एक ही तरीका है कि कॉरपोरेट जगत का सामाजीकरण किया जाए।उसके बाद उसको सही दिशा में लगाया जाए।यानी अंधाधुंध फालतू चीजें बनाने के बजाये सिर्फ वे ही चीजें बनायी जाए जिनकी समाज को जरूरत हो।यानी चीजें मुनाफा कमाने और कारपोरेट साम्राज्य खड़ा करने के लिए न बनाकर समाज की जरूरतों के हिसाब से बनायी जानी चाहिए।इससे भ्रष्टाचार ही नहीं,देश की तमाम समस्याएं हो सकती है।साथ ही लाबिस्ट जैसे दलालों की जरूरत नहीं रहेगी।राजनीति प्रशासन और कॉर्पोरेट का जो भ्रष्ट गठबंधन है,वह समाप्त हो जाएगा।
आज देश में बेरोजगारी व गरीबी का असली कारण कॉर्पोरेट घराने व पूंजीपति वर्ग ही है।फिलहाल देश में कारपोरेट व पूँजीवादी प्रजातंत्र है..राष्ट्र की न सिर्फ 70 प्रतिशत सम्पति पर तक़रीबन आठ हजार पूंजीपति व कॉर्पोरेट काबिज़ है बल्कि विधायिका,कार्यपालिका व न्यायपालिका भी इन्हीं की मुट्ठी में है व राष्ट्र की सारी संपति पर जमें हुए है।इनकी सत्ता को पलट कर ही जनता का लोकतंत्र कायम हो सकता है।सारे के सारे रोजगार पर अपना एकाधिकार जमा रखा है।सारा देश बेरोजगार बिना धंधा का हो चुका है पहले तो ये पसीना पीते थे अब खून पी रहे है।देश के नागरिक कुपोषण के शिकार हैं महिलाओं के शरीर में खूनपानी नहीं रह गया है।शिक्षित युवक रोजगार के लिए भटकता चल रहा है।मानव नहीं पूंजीपति मशीनों को तरजीह दिया जा रहा है।निजी आर्थिक मुनाफा के आगे वह सामजिक व राष्ट्रीय बेनिफीट को भूल चुका है।मुट्ठीभर कॉर्पोरेटों व माल्टिनेशनल के विकास को देश व राष्ट्र विकास समझते है।भारत एक कंपनी में तब्दील हो चुका है।ऐसे में सिर्फ एक ही रास्ता शेष है कि देश की अधिकांश पूंजी पर मुट्ठीभर लोगों का अधिकार समाप्त कर दिया जाएगा तो देश की 70 प्रतिशत भूखी नंगी जनता की समस्या हल हो जाएगी।जब गैर कानूनी संपति इकट्ठी करना संगीन अपराध बन जाएगा तो लोग सम्पति इस तरह नहीं इकट्ठी करेंगे,और करेंगे भी क्यों; शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार की जिम्मेदारी राज्य व्यवस्था की होगी।पैसा जो आज के समय में सबसे बड़ा मूल्य बन गया है,वह अपनी सामजिक हैसियत खो देगा।फिर अच्छे सामाजिक मूल्यों की स्थापना हो सकेगी।समाज के सामने भ्रष्ट तरीके से अधिक से अधिक पैसे कमाने का लक्ष्य नहीं रहेगा तो राजकोष की संपति समाज के विकास में योगदान दे सकेंगी ।यही व्यवस्था परिवर्तन है और बिना इस व्यवस्था परिवर्तन के किसी भी तरह भ्रष्टाचार को रोका नहीं जा सकता।जब तक मूल व्यवस्था यानी कारपोरेट के भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जाएगा भ्रष्टाचार का यह कारोबार अनवरत चलता ही रहेगा।यह काम कैसे और कब होगा,यह देश की अधिकांश मेहनतकश जनता की चेतना,राजनितिक सक्रियता,संगठन और संघर्ष पर निर्भर है।
(लेखक के अपने विचार है।)


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