राष्ट्रनायक प्रतिनिधि।
गड़खा (सारण)। देश के 5 राज्यों में इन दिनों विधानसभा चुनाव शुरू हो चुकी है। लेकिन सबसे ज्यादा पश्चिम बंगाल में राजनीतिक लाभ के लिए धर्म का उपयोग किया जा रहा है। कोई खुद को मां काली, कोई शिव तो कोई खुद को स्वयं श्री राम का भक्त बता रहा है। यह आरोप-प्रत्यारोप सिर्फ राजनेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि कार्यकर्ताओं पर भी बुरा असर डाल रही है।कई जगह टीएमसी और बीजेपी के कार्यकर्ता एक-दूसरे से उलझ कर मारपीट भी कर रहे हैं। वही कुछ नेता राजनीतिक लाभ के लिए भगवान राम और माँ काली के लिए अपमानजनक शब्दों का भी प्रयोग कर रहे हैं। भारतीय राजनीतिक में धर्म का उपयोग शुरू से ही होता आया है, परंतु इन दिनों इसका उपयोग इस कदर बढ़ गया है कि वह समाज और राष्ट्र के लिए हानिकारक साबित हो सकती है। धर्म से राजनीति को हमेशा अलग रखने की आवश्यकता होती है। राजनीति क्षणिक सुख के लिए है। जबकि धर्म आध्यात्मिक आनंद और मोक्ष की प्राप्ति के लिए होती है। चुनाव में लोग धर्म की परिभाषा भी अपने अपने तरीके से लाभ के अलग अलग बता रहे हैं, जो सरासर गलत है। चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक में धर्म,आस्था का उपयोग पर रोक लगनी चाहिए।क्योंकि इससे करोड़ो लोगों के धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचती हैं।राजनीतिक में धर्म होना चाहिए ना कि धर्म में राजनीति।
मुरारी स्वामी, सराय बक्स, गड़खा, सारण, बिहार।
(लेखक सन्त के साथ-साथ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)
नोट:- ये लेखक के अपना निजी विचार हैं।


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