राष्ट्रनायक न्यूज

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मेडिकल छात्र संजीत की यूक्रेन से हुई सकुशल घर वापसी, परिजनों ने ली राहत की सांस

राष्ट्रनायक न्यूज।
मांझी (सारण)। रूस एवं यूक्रेन के बीच जारी युद्ध मेन यूक्रेन के कीव में फंसे मेडिकल छात्र व मांझी के मुबारकपुर गांव निवासी व देसी चिकित्सक नागेश्वर सिंह के पुत्र संजीत कुमार सिंह का सकुशल घर वापसी पर परिजनों ने राहत की सांस ली है। परिजनों ने बताया कि यूक्रेन में छह वर्षों से जारी मेडिकल की पढ़ाई का आखिरी सेमेस्टर पूरा होने में महज दो माह शेष रह गए थे इसी बीच रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला कर दिया गया और संजीत के डॉक्टर बनकर लोगो की सेवा करने का सपना अधूरा छूट गया जिसका उसे मलाल है। उधर युद्ध छिड़ने तथा अपने बेटे के बंकर में छिपे होने की सूचना पाकर चार दिनों तक घर का चूल्हा नही जला। परिजन लगातार परेशान रहे। संजीत ने बताया कि बीस फरवरी को यूक्रेन में स्थित भारतीय दूतावास द्वारा यूक्रेन छोड़ने की सामान्य घोषणा की गई यदि सख्ती से उसपर अमल किया गया होता तो शायद फरवरी माह में ही सभी भारतीय यूक्रेन से सकुशल निकाल लिए गए होते। बातचीत के क्रम में संजीत ने यूक्रेन के सुमी शहर में फंसे करीब ढाई हजार भारतीयों को निकालने का भारत सरकार का प्रयास की सफलता की कामना की। उसने बताया कि यूक्रेन से भारत वापसी के लिए 24 फरवरी की फ्लाइट का टिकट था लेकिन तबतक युद्ध शुरू हो गया और फ्लाइट रद्द कर दिया गया। अन्यथा उसी दिन वहां से निकल गए होते। उसने बताया कि कीव से निकलने के दौरान उन्हें दोयम दर्जे की समस्या से जूझना पड़ा। और नौ घण्टे तक ट्रेन में सवार होने का इंतजार करना पड़ा। महज पांच मिनट के विलम्ब की वजह से हंगरी में भी 28 फरवरी की फ्लाइट छूट गई। उसने बताया कि यूक्रेनी नागरिकों के ट्रेन पर सवार होने के बाद ही मनमानी तौर पर अन्य देशों के नागरिकों को ट्रेन पर सवार होने दिया जाता था। इस दौरान ट्रेन पर सवार होने के लिए गैर युक्रेनियों से रिश्वत के तौर पर करीब पचपन हजार रुपये की अवैध वसूली भी की गई। चूंकि ट्रेन सेवा निःशुल्क था। हालाँकि पोलैंड के बदले हंगरी क्यों और कैसे पहुंच गए इसका छात्रों को पता ही नही चला। हालाँकि हंगरी में वे लोग भयमुक्त होकर चैन से रहे। संजीत के मुताबिक यूक्रेन की राजधानी कीव में स्थित भारतीय दूतावास द्वारा उन्हें समुचित सहयोग नही किया गया। बाद में हंगरी से इंडिगो की फ्लाइट से उनलोगों को पहले दिल्ली तथा फिर पटना सरकारी खर्चे से लाया गया। फिर पटना से घर तक उन्हें लाने के लिए सरकारी वाहन उपलब्ध कराया गया तथा सरकारी स्तर पर ही खाने पीने की भी मुकम्मल व्यवस्था की गई थी।