हर बात कहेला
अलग अलग मंच होला
केहुँ कबो मुजरिम
त कबो पंच होला
साँच के मान राखहीं ला
हर सितमगर के अंत होला।
फूल ना खिले
त दोष माली के ना होला
जीजा रुस जास त
दोष साली के ना होला
सराब जेतना नशीला होय
दोष पयाली के ना होला
शीशा से पथल
कबो ना टूटे
करमवीर के लक्ष
कबो ना छूटे
आइना नियन मन साफ राखी
ऐह में कबो साँच ना छुपे
भाई के हाथ
कबहूँ छोटे ना चाहीं
कवनो गलती पर बेरी बेरी
घुटे के ना चाही
बड़ी नाजुक होला दिल
ई कबो टूटे के ना चाही।
सागर के कहा
थाह लागेला
गरीबी पर मत हंँसी
इनकर आह लागेला
भटक जाला जवन आत्मा
उसे नू अपना से पनाह माँगेला।
कही सिरजन त
कहीं विनाश होला
सभे के अपन अपन
इतिहास होला
जे मर के भी ना मरल
ऊहे नू बरहम पिचास होला।

लेखक- सूर्येश प्रसाद निर्मल शीतलपुर तरैयाँ


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