डॉल्फिन पर भला किसकी नजर, आखिर इनके साथ इतनी क्रूरता क्यों?

दिल्ली ऐजेंसी। जरा उस दृष्टिबाधित व्यक्ति की कल्पना कीजिए, जो किसी अजनबी स्थल पर गलती से ठोकर खाकर गिर गया है। वह उठना चाहता है, लेकिन अजनबी इलाके में उसे दिशा ज्ञान नहीं हो रहा है। मगर वह वहां गलत इरादे से इकट्ठा समूह की मौजूदगी को भांप सकता है। बिना किसी चेतावनी के उसके सिर पर एक लाठी से चोट पड़ती है, फिर ताबड़तोड़ उस पर हमला होता है। अंत में एक कुल्हाड़ी उसे चीरती हुई निकलती है और ठग भाग जाते हैं, और फिर इस हंगामे की वजह से ग्रामीणों का एक समूह घटनास्थल पर पहुंचता है। लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। वह बर्बर तरीके से मरा हुआ पाया जाता है। और इसमें उसकी अपनी कोई गलती नहीं होती।
यह एक दृष्टिहीन, निर्दोष और निहत्था इंसान हो सकता था। लेकिन ऐसा नहीं था। वह एक डॉल्फिन थी-पृथ्वी के सबसे प्राचीन और भद्र जीवों में से एक, जिससे किसी को कोई खतरा नहीं है और जिसकी नदी और समुद्र की सतह पर छलांग कहीं भी किसी के लिए भी सबसे आनंदमय दृश्यों में से एक है। फिर भी उसकी चर्बी और तेल के लिए भारत और दक्षिण एशिया के अन्य हिस्सों में उसका शिकार किया जाता है। और वह भी इस गलत धारणा की वजह से कि इसकी चर्बी और तेल में औषधीय गुण होते हैं। कभी गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु और उनकी सहायक नदियों में इसकी संख्या काफी थी, जो कम हो गई।
इन दिनों इसकी संख्या में क्रमिक बढ़ोतरी हो रही है। ऐसा शोधकतार्ओं और वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, राज्य वन्यजीव और वन विभागों के साथ-साथ पर्यावरण मंत्रालय और विश्व वन्यजीव कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) जैसे अंतरराष्ट्रीय समूहों के प्रयासों की वजह से हुआ है। हालांकि इनकी संख्या बढ़ी हैं, फिर भी कम हैं। कुल मिलाकर दक्षिण एशिया में लगभग 5,000 डॉल्फिन हैं, जिनमें से अधिकांश भारत में हैं। लेकिन स्पष्ट रूप से ये प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में एक बहुत बुरी घटना सामने आई है। हमलावरों को गिरफ्तार कर लिया गया है, लेकिन मामला कैसे आगे बढ़ेगा, इसका अनुमान कोई भी लगा सकता है। डॉल्फिन वन्य जीव अधिनियम की अनुसूची-1 की प्रजाति है, जिसे अत्यधिक संकटग्रस्त माना जाता है और इसका शिकार करने वाले को सात साल की कैद और 50,000 रुपये जुमार्ने का प्रावधान है। यदि दोषी व्यक्ति जुमार्ना नहीं दे पाता है, तो उसे छह महीने और जेल की सजा काटनी होगी।
यदि मनुष्य अन्य प्रजातियों के मूक और असंगठित प्राणियों के प्रति इतना क्रूर है, तो जाहिर है कि वे अपने से कमजोर लोगों के प्रति कम क्रूर और हिंसक नहीं होंगे। यहां तक कि उनकी सुरक्षा का धार्मिक आधार भी है। वामन पुराण (नौवें अध्याय के 17वें श्लोक) में सिसुमारा (डॉल्फिन) ‘जिसे जलधि कहते हैं, को वरुण की सवारी कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति रुद्र के कान की गंदगी से हुई थी। इसका रंग गहरा और गति दिव्य होती है।’ इसका दिव्य रूप कहीं अन्यत्र भगवान विष्णु के बा‘ रूप के रूप में वर्णित है। गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन हमारे देश की राष्ट्रीय जलीय जीव है अथवा नदी का प्रमुख जीव है, जैसे बाघ राष्ट्रीय पशु है और स्थलीय वन्यजीवों में प्रमुख है। दक्षिण एशिया में जितनी डॉल्फिन हैं, उसका दसवां हिस्सा असम में है। कम दिखाई देने के कारण डॉल्फिन शिकार खोजने के लिए मछली, ताजे पानी के केकड़े, सरीसृप और पानी के कीड़े की ध्वनियों पर निर्भर करती हैं। वे आपस में बहुत बात करती हैं और ध्वनियों की मदद से संवाद करती हैं।
एनिमेलिया डॉट बायो वेबसाइट के मुताबिक, दक्षिण एशियाई नदियों में पाई जाने वाली डॉल्फिनों को सबसे अधिक खतरा मशीनीकृत जहाज, मछली पकड़ने के जाल, शिकार जैसी मानवीय गतिविधियों से है और उनके तेल का उपयोग चारे के लिए किया जाता है। ‘उद्योगों से जहरीले पानी और कृषि रसायन भी इनकी जनसंख्या में गिरावट के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं, क्योंकि ये रसायन डॉल्फिन के शरीर में कई गुना बढ़ जाते हैं। शायद सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा कई नदियों पर 50 से अधिक बांधों का निर्माण है, जिससे आबादी का अलगाव होता है और जीन पूल, जिसमें डॉल्फिन प्रजनन कर सकती हैं, संकीर्ण हो जाता है। ‘डॉल्फिन को राज्य का जलीय जीव घोषित करने के बाद सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने से असम में इसका शिकार घटा है, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात है कि शिकारियों को वैकल्पिक आजीविका प्रदान करने से उन्होंने शिकार करना छोड़ दिया है। सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आय और आजीविका महत्वपूर्ण है।


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