पूणार्हुति के साथ लक्ष्मीनारायण महायज्ञ का समापन
- वैदिक मंत्रों की गूंज के बीच पूरा माहौल बना भक्तिमय
जगदीशपुर (भोजपुर)। जगदीशपुर नगर में बहर्षि मां काली मंदिर के जीर्णोद्धार में चल रहे श्री लक्ष्मीनारायण महायज्ञ में अंतिम दिन पूणार्हुति के साथ लक्ष्मीनारायण महायज्ञ का समापन हो गया।बुधवार को अंतिम दिन महायज्ञ में श्रद्धा व आस्था के बीच पूरा माहौल भक्तिमय बना रहा।वैदिक मंत्रों की गूंज के बीच माता रानी का मंदिर व महायज्ञ स्थल का उतस्वी नजारा देखते ही बन रहा था।विभिन्न जगहों के महिला-पुरुष श्रद्धालुओं की सैलाब उमड़ने से रौनक के बीच पूरा माहौल उत्सवी रहा।महायज्ञ मंडप का परिक्रमा करने व माता रानी का पूजा अर्चना करने के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। यज्ञ में पहुंचने वाले श्रद्धालु जीयर स्वामी जी महाराज की एक झलक पाने तथा उनका दिव्य उपदेश एवं प्रवचन सुनने को व्याकुल दिखे। सुबह से ही देर रात तक आम से खास लोग सभी हाथ जोड़े स्वामी जी के दर्शन के लिए खड़े दिख रहे थे।अहले सुबह महाआरती के साथ महायज्ञ शुरूआत हो रहा है।जीयर स्वामी ने कहा कि गंगा स्नान का मतलब अनीति, अन्याय,बेईमानी,अधर्म,पाप का त्याग से है। शास्त्र में बताया गया है कि जहां पर इस घर में, इस समाज में,इस राष्ट्र में,जिस प्रजा में,जिस समुदाय में ईश्वर ब्रम्ह को कभी याद न किया जाता हो,कभी चिंतन न किया जाता हो, नितध्यासन न किया जाता हो,गुण गान न किया जाता हो वह घर श्मशान के समान बताया गया है।जहां पर सदाचारी,संत महात्मा,ज्ञानी स्त्रियों का आदर नही हो,बालकों को शिक्षा न दिया जाता हो वह घर श्मशान के समान बताया गया है।जहां पर जुआ खेला जाता है,शराब का व्यसन है,अनेक प्रकार खान पान उपद्रव कारी है मांस इत्यादि का सेवन होता हो वह भी घर श्मशान के समान बताया गया है।
भोजन तो अनेक योनियों में हम करते हैं शयन तो हम अनेक योनियों में हम करते हैं। संतान उत्पति तो अनेक योनियों में करते हैं। केवल इसके लिए इस संसार में हम जन्म नही लिए हैं। यदि इन सबके लिए इस संसार में हम आए होते तो परमात्मा हमलोगों को मनुष्य नही बनाते बल्कि इसके जगह पर और कोई जन्तु बनाते। मानव की पहचान संस्कृति है, संस्कार है। सभ्यता है,सरलता है,सहजता है,कोमलता है।यदि यह मनुष्य में न हो केवल संसार में पशुओं के समान भोजन करे,संतानोत्पत्ति करे मनुष्य और पशु में कोई अंतर नही है।


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