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किसानों को सरकार से मिली बड़ी निराशा : भारतीय किसान यूनियन

किसानों को सरकार से मिली बड़ी निराशा : भारतीय किसान यूनियन

छपरा (सारण)। केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा घोषित आर्थिक पैकेज पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश प्रवक्ता प्रमोद सिंह टुन्ना ने कहा कि पंचो की बात सर-माथे पर खूंटा वहीं गड़ेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस पूरानी कहावत को चरितार्थ कर दिखा दिया है।

निर्मला सीतारमण द्वारा किसानों के लिए घोषित आर्थिक पैकेज में कृषि लोन को तीन महीने आगे बढ़ाने एवं नये किसान क्रेडिट कार्ड से किसानों को लोन देने के अतिरिक्त है क्या?हमारे नीति निर्धारकों को कब समझ में आयेगा कि अगर हमारी कृषि,कृषि आधारित उद्दोगो के लिए अनुकूल माहौल होता तो लोन की आवश्यक्ता ही कहां था। बैंक उन्हें लोन देने में इतना नहीं हिचक रहे होते।बैंको के पहले से ही इतनी राशि पड़ी हुई है।नया लोन लेकर कोई भी जोखिम उठाना नहीं चाहेगा।हमारे किसान,कृषि उद्दोग और न ही बैंक।

कारण साफ है कि भारत पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट में फंसा है।यह आर्थिक संकट का जाल कोरोना की ही देन नहीं है बल्कि कोरोना पूर्व का है।कोरोना संकट ने इसमें आग में घी का काम किया है।भारत में नोटबंदी और जीएसटी से तबाह हूई अर्थव्यवस्था को मोदी सरकार द्वारा मेक इन इंडिया,स्टार्ट अप,स्मार्ट सिटी,सांसद ग्राम, विदेशी निवेश,पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था जैसे जूमलों से ढ़कने की कोशिश की गई।पर,पिछले वित्तीय वर्ष के तीसरी तिमाही के आंकड़े आने तक खूद मोदी सरकार मान चुकी थी कि हमारी विकास दर अब मात्र 4.5 फीसदी तक ही रहेगी।कृषि की विकास दर 2.7 फीसदी पर सिमट चूकी है।जिसके आधार पर सरकार किसानों की आमदनी दोगूणी करने का दम भरती है।इससे बाजार में मांग कभारी अभाव पैदा हो गया।यानि,देश में आम आदमी की क्रय शक्ति में भारी गिरावट आ चूकी थी।

तब,तमाम अर्थशास्त्रियों,विपक्षी दलों,ट्रेड यूनियनों से लेकर किसान संगठनों ने सरकार से मांग की थी कि देश में अगर तरलता(लिक्विडिटी) बढ़ाना है तो आम लोगों के हाथ में पैसा देना होगा।इसमें मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी व न्यूनतम वेतन में बृद्धि,मनरेगा में कम से कम 200 दिनों का काम और शहरी गरीबों के लिए भी मनरेगा जैसे स्कीम लाना तथा किसानों को‌ उनकी उपज के लागत का डेढ़ गूणा दाम और सरकारी खरीद की गारंटी व देश के हर किसान के लिए एक न्यूनतम आय की गारंटी,किसान सम्मान की राशि बढ़ाकर 24000 रुपये सलाना,किसानों का सभी प्रकार के लोन माफ करना,फल-सब्जी-दूध-पाल्ट्री फार्म,मधूमक्खी पालन,मछली उत्पादक किसानों की भरपाई की उपाय किए जाने की मांग थी।पर,मोदी सरकार बड़े कारपोरेट घरानों पर देश का साधन और संसाधन लूटाती रही।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की घोषणाओं में कहीं भी किसान और मजदूरों को स्थान मिलता नहीं दिख रहा है। मार्च-अप्रैल के वेतन बिना ही भूख से लड़ते-मरते मजदूरों का बड़ा हिस्सा अपने गांवो की ओर लौट रहा है।केन्द्र और राज्य सरकारों की पूर्ण उपेक्षा से इतनी अमानवीय तकलीफों को झेल जो मजदूर गांव लौटे है,उनका बड़ा हिस्सा सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा की गारंटी के बिना जल्दी वापसी नहीं करेगा।जिससे कई राज्यों की खेती प्रभावित होगी।

दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि कोरोना संकट ने बाजार में मांग का और भी बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।जीवन के लिए बहूत जरुरी बस्तुओं को छोड़ कर बाकि उत्पादों की मांग तबतक नहीं बढ़ेगी जबतक देश के 80 कड़ोर गरीबों,मजदूरों और किसानों की क्रय शक्ति नहीं बढ़ जाती।