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अफगानिस्तान में तालिबान का वर्चस्व भारत में कश्मीर शांति के लिए खतरा!

नई दिल्ली, (एजेंसी)। अफगानिस्तान में करीब बीस साल से जारी अमेरिका का सैन्य अभियान 31 अगस्त को पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। अमेरिकी सैनिकों के वापस जाने से तालिबान अपने पैर पसारना शुरू कर देगा। ज्यादा समय नहीं लगेगा जब अफगानिस्तान पर तालिबान का राज होगा। जानकार बताते हैं कि अमेरिकी सैनिकों के वापस जाने के बाद अब तालिबान पर लगाम लगाने की आसार काफी कम दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में तालिबानी ताकतें और भी ज्यादा मजबूत हो जाएंगी। ऐसे में भारत के लिए भी मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। भारत हमेशा से अफगानिस्तान के साथ खड़ा रहा है और मंगलवार को शंघाई सहयोग संगठन की बैठक से पहले भारत के विदेश मंत्री ने अफगानिस्तान के अपने समकक्ष के साथ मुलाकात की। इस मुलाकात को लेकर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ट्वीट किया।

उन्होंने कहा कि मेरे दुशान्बे दौरे की शुरूआत अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मोहम्मद हनीफ अतमर से मुलाकात के साथ हुई। हालिया घटनाक्रम को लेकर उनकी अद्यतन जानकारी को सराहा। अफगानिस्तान पर एससीओ संपर्क समूह की कल होने वाली बैठक को लेकर उत्साहित हूं। जानकार बताते हैं कि कुछ महीनों में तालिबान सत्ता पर काबिज हो सकता है। ऐसे में भारत को अरबों डॉलर की परियोजनाओं के साथ-साथ वहां काम करने वाले भारतीय नागरिकों की भी चिंता है। इसके अलावा तालिबान के आने से भारत को जम्मू-कश्मीर को लेकर और भी ज्यादा सतर्क होने की जरूरत होगी। विगत वर्षों में देखा गया है कि पाकिस्तान ने तालिबान का इस्तेमाल कश्मीर में आतंक फैलाने के उद्देश्य से किया है।

आपको बता दें कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा गठित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद को तैयार करने में तालिबान ने अहम भूमिका निभाई और सभी यह जानते हैं कि जम्मू-कश्मीर में आए दिन जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी घुसपैठ की कोशिश करते रहते हैं। अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों के जाने से पाकिस्तान, चीन और तालिबान के बीच रिश्ते पहले से बेहतर होते हुए दिखाई दे रहे हैं। हालांकि चीन ने तालिबान से सभी आतंकवादी बलों से पूरी तरह संबंध तोड़ने को कहा है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने दुशान्बे में कहा कि अफगानिस्तान में युद्ध, खासकर गृह युद्ध से बचा जाना चाहिए। उन्होंने अफगानिस्तान में राजनीतिक सुलह तलाशने और सभी प्रकार के आतंकवादी बलों को वहां मजबूत होने से रोकने के लिए अंतर-अफगान वार्ता पुन: शुरू करने की वकालत है। इसके बावजूद भारत को सतर्क रहने की आवश्यकता है।