राष्ट्रनायक न्यूज

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ग्लोबल वार्मिंग-ग्लोबल वार्निंग

राष्ट्रनायक न्यूज।
आशंकाएं बिल्कुल सच साबित हो रही हैं। पिछले कई वर्षों से वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन पर चेतावनियां दे रहे हैं लेकिन कोई सुनने को तैयार ही नहीं। वायुमंडल को गर्म करने वाली गैसों का उत्सर्जन जिस तरह से जारी है, उसकी वजह से सिर्फ दो दशकों में तापमान की सीमाएं टूट चुकी हैं। ग्लोबल वार्मिंग अब अंतिम रूप से ग्लोबल वार्निंग बन चुकी है। दुनिया भर के वैज्ञानिक चीख-चीख कर कह रहे हैं कुछ करो नहीं तो कयामत को कोई नहीं रोक सकता।

बावजूद इसके अमेरिका हो या चीन या फिर कोई देश अपने राष्ट्रीय हितों की एवज में क्लोरोफ्लोरो गैसों के उत्पादन में किसी भी तरह की कटौती करने को तैयार नहीं। इंटरगवर्नमेंटल पैनल आन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पृथ्वी का औसत सतह का तापमान साल 2030 तक 1.5 डिग्री सैल्सियस बढ़ जाएगा। यह बढ़ौतरी पूवार्नुमान से एक दशक पहले हो जाएगी। बढ़ते तापमान से दुनिया भर में मौसम से जुड़ी भयंकर आपदाएं आएंगी। दुनिया पहले ही बर्फ की चादरों के पिघलने, समुद्र के बढ़ते स्तर और बढ़ते अम्लीकरण में बहुत बड़े बदलाव झेल रही है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है अगर ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया तो भारत में चमोली जैसी प्राकृतिक आपदाएं बढ़ सकती हैं।

जलवायु परिवर्तन ने प्राकृतिक आपदाओं की संख्या और तीव्रता बदली है। बफीर्ले पहाड़ों वाले क्षेत्र में हिमस्खलन बढ़ गए हैं, पहाड़ों पर भूस्खलन की घटनाएं लगातार हो रही हैं। अपनी नैसर्गिक खूबसूरती के लिए मशहूर उत्तराखंड गत फरवरी माह में एक बेहद दर्दनाक हादसे का गवाह बना था। चमोली शहर में देखते ही देखते रौद्र हुई धौलीगंगा अपने बहाव में जाने क्या-क्या बहा ले गई। अभी तक माना जा रहा है कि यह जल प्रलय ग्लेशियर के फटने से आई है, लेकिन चमोली की जल प्रलय ने हिमालय पर मंडराते महासंकट की तस्वीर खींच कर रख दी।

हिमाचल में धर्मशाला के भागसुनाग में जलप्रलय ने हिमालय पर संकट को और पुख्ता आधार दे दिया। दुनिया का तीसरा ध्रुव कहे जाने वाले हिमालय को लेकर जो डाटा मौजूद है उससे जाहिर हो रहा है कि संकट सिर्फ चिंता से खत्म नहीं होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर हिमालय के ग्लेशियरों में क्या चल रहा है। ग्लोबल वार्मिंग से हिमस्खलन का खतरा बढ़ जाता है, ऐसा इसलिए है क्योंकि हिमस्खलन ढलान पर बर्फ पर चट्टान के ऊपर ज्यादा वजन ही वजह से होते हैं। बर्फबारी की वजह से भी हिम चट्टानें खिसक जाती हैं। एक अध्ययन में पाया गया था कि हिमालय के हिन्दुकुश क्षेत्र में तापमान बढ़ रहा है।

वैश्विक तापमान बढ़ने से अधिक ऊंचाई की वजह से हिमालय पर ज्यादा है। अगर वैश्विक तापमान कम नहीं किया गया तो हिमालय के ग्लेशियर्स का दो-तिहाई हिस्सा पिघल सकता है। ग्लोबल वार्मिंग समूचे विश्व में मानवता के लिए खतरे की घंटी है लेकिन आईपीसीसी की हालिया रिपोर्ट में अगला दशक भारत के लिए निर्णायक बताया गया है। ऐसे में भारत में चमोली जैसी आपदा, सुपर साइक्लोन ताऊते हो या देश के कई हिस्सों में जबर्दस्त बारिश हो, भारत को ऐसी आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है। अगर गम्भीरता से देखा जाए तो यह भारत के लिए बहुत बड़ा संकट होगा। इंसानों के कारण हुए बदलावों ने असावधानीपूर्वक तरीके से पर्यावरण को ऐसा बना डाला है कि हजारों सालों में भी इसे बदला नहीं जा सकता। पूरी दुनिया इस समय रिकार्ड तोड़ तापमान, जंगलों में आग और विनाशकारी बाढ़ को देख रही है।

2015 में पैरिस जलवायु समझौते के तहत वैश्विक औसत तापमान को 2 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ने का लक्ष्य रखा गया था। किसी भी समस्या का सबसे खतरनाक पहलु होता है कि हमें यह पता होता है कि समस्या की जड़ कहां हैं और हम उस जड़ को खत्म करने की बजाय उसे सहला रहे होते हैं। कोई कुछ करने को तैयार नहीं कि यह रुके और दुनिया का सामूहिक भविष्य बचा रहे। अब नवम्बर में ग्लासगो में होने वाले संयुक्त राष्ट्र सीओपी 26 सम्मेलन होने वाला है। अगर जलवायु परिवर्तन को नियंत्रण में लाने पर सहमति बन जाए और 196 देश मिलकर एक बड़ा लक्ष्य तय करें तो लक्ष्य हासिल करना मुश्किल नहीं। अगर वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस के स्तर को रोकने में सक्षम हो गए तो भारी तबाही को रोका जा सकता है। आईपीसीसी रिपोर्ट उन देशों को चेतावनी है जिन्होंने अगले दशकों के लिए उत्सर्जन में कटौती की कोई योजना ही तैयार नहीं की है। अब सवाल हमारे सामने है कि इस स्थिति में इंसान क्या करे। इंसान को अपनी विशाल प्राकृतिक सम्पदाओं को सुरक्षित रखने के लिए बहुत काम करना होगा। जंगल बढ़ाने होंगे, इसके लिए पेड़ लगाने होंगे। हमें ग्लेशियर्स को मानिटर करना होगा। सरकार को ऐसी नीतियां बनानी होंगी ताकि पर्यावरण सुरक्षित रहे।