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पैरालंपिक में मेडल जीतने के बाद राजस्थान वन विभाग की खुली नींद, खिलाड़ियों को एक महीने की भी सैलरी नहीं दी थी

नई दिल्ली, (एजेंसी)। टोक्यो पैरालंपिक में भारत के खाते में अब तक 2 स्वर्ण, 5 रजत और 3 कांस्य पदक आए हैं। टोक्यो पैरालंपिक में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक अवनि लेखरा ने हासिल किया। दो बार के पैरालंपिक गोल्ड मेडलिस्ट देवेंद्र झाझरिया ने टोक्यो में भी अपना शानदार प्रदर्शन जारी रखते हुए रजत पदक पर कब्जा जमाया। वहीं जेवलिन थ्रोअर सुंदर सिंह गुर्जर ने एफ-46 वर्ग में ही भारत के लिए कांस्य पदक जीता। जिसकी बाद मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत विभन्न राज्यों के मुख्यमंत्री और नेताओं ने बधाई दी। इसी क्रम में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गोल्ड मेडल जीतने वाली अवनि लखेरा को 3 करोड़ रुपये, जेवलियन थ्रोअर देवेंद्र झाझड़िया को दो करोड़ रुपये और कांस्य पदक विजेता सुंदर गुर्जर को एक करोड़ रुपये इनामी राशि देने की घोषणा की। एक तरफ तो पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को बधाई और इनामों से नवाजा जा रहा है। लेकिन सरकारी विभाग के काम करने के तरीकों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जिसकी वजह है पैरालंपिक मेडलिस्ट को अभी तक सैलरी नहीं दिया जाना।

निशानेबाजी में गोल्ड मेडल जीतने वालीं अवनि लेखरा, जेवलियन में सिल्वर मेडल जीतने वाले देवेंद्र झाझड़िया और ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाले सुंदर सिंह गुर्जर तीनों ही खिलाड़ियों की पदक की चमक के बाद राजस्थान के वन विभाग की नींद खुली और उसे याद आया कि उनकी तरफ से इन पदकवीरों को एक महीने का वेतन भी नहीं दिया गया है। इन्हें पांच से 10 महीने पहले नौकरी पर रखा गया था लेकिन वेतन अभी तक बकाया था।

अंग्रेजी अखबार टााइम्स आॅफ इंडिया कि रिपोर्ट के अनुसार लेखरा को 16 अप्रैल को भर्ती किया गया था, वहीं झाझरिया और गुर्जर को वन विभाग द्वारा 5 नवंबर और एक दिसबंर 2020 को भर्ती किया गया था। हालांकि वन विभाग की तरफ से दावा किया गया है कि कागजात पूरे नहीं होने पर उनके वेतन में देरी हुई। इसके साथ ही वन विभाग की ओर से कहा गया कि इसकी वजह है तीनों का राज्य के बाहर रहकर टोक्यो खेल की तैयारी किया जाना। टाइम्स आॅफ इंडिया से बात करते हुए एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि स्थायी सेवानिवृत्ति खाता संख्या बनाने और इसे आधार से जोड़ने के लिए किसी भी कर्मचारी को फिजीकली उपस्थित होना जरूरी है। चूंकि वे राजस्थान में नहीं थे, इसलिए ऐसा नहीं किया जा सकता था। इसके अलावा, खिलाड़ी औपचारिक रूप से अरण्य भवन (वन विभाग मुख्यालय) के बजाय राज्य सचिवालय में सेवा में शामिल हुए।