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क्या सरकार लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने पर कर रही विचार? अगली बार 1000 सीटों पर होगा चुनाव?

नयी दिल्ली, (एजेंसी)। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी के लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने के दावे के बाद चुनावों को लेकर चर्चा शुरू हो चुकी है। बता दें कि मनीष तिवारी ने हाल ही में कहा था कि भाजपा सरकार लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए एक प्रस्ताव लाने वाली है। अगर ऐसा प्रस्ताव लाया जाता है तो आम लोगों की भी राय लेनी चाहिए। दरअसल, मनीष तिवारी ने भाजपा के एक संसदीय सहयोगियों से प्राप्त विश्वसनीय जानकारी के आधार पर दावा किया था। मनीष तिवारी ने तो इसके पीछे का तर्क भी दिया था कि जो नए संसद भवन का निर्माण हो रहा है उसमें 1000 सदस्यों के बैठने की क्षमता है। यह कोई पहली दफा नहीं है जब लोकसभा सीटों की संख्या पर बातचीत हो रही है। करीब दो साल पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इंडिया फाउंडेशन द्वारा आयोजित द्वितीय अटल बिहारी वाजपेयी स्मृति व्याख्यान में कहा था कि भारत में निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या मतदाताओं की संख्या के अनुपात से काफी ज्यादा है।

उन्होंने सीटों की संख्या बढ़ाए जाने की वकालत करते हुए कहा था कि अंतिम बार 1977 में लोकसभा की संख्या निर्धारित की गई थी। जो 1971 की जनगणना पर आधारित थी। उस वक्त देश की आबादी 55 करोड़ थी लेकिन अब 40 साल से अधिक का समय हो चुका है। आबादी भी दोगुने से ज्यादा बढ़ गई है। ऐसे में अब परिसीमन पर लगी रोक को हटाने के बारे में विचार करना चाहिए। दो साल पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने संबोधन में जो बातें कही थी और मनीष तिवारी का जो दावा है, उससे यह प्रतीत होता है कि भाजपा परिसीमन पर लगी रोक पर विचार करना शुरू कर चुकी है। आपको बता दें कि साल 2026 तक परिसीमन में रोक लगी हुई है। ऐसे में उसके बाद परिसीमन हो सकता है और सीटों की संख्या में इजाफा होगा। माना तो यहां तक जा रही है कि दक्षिण के मुकाबले उत्तर की सीटें ज्यादा बढ़ेंगी। हालांकि अभी कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं कहा जा सकता है। जानकार बताते हैं कि साल 2024 से पहले सीटों की संख्य में बदलाव मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार मुमकिन नहीं है लेकिन सरकार चाहे तो संसद में दो तिहाई बहुमत से इस व्यवस्था में बदलाव कर सकती है।

अनुच्छेद-81: अनुच्छेद-81 लोकसभा की संरचना को परिभाषित करता है। जिसके मुतबिक सदन में अधिकतम 550 निर्वाचित सदस्य ही होंगे। जिनमें से राज्यों के निर्वाचन क्षेत्रों से अधिकतम 530 तथा संघशासित प्रदेशों से अधिकतम 20 सदस्य होंगे। ऐसे में जब कभी भी सीटों की संख्या में बढ़ोत्तरी करनी होगी तो संविधान के अनुच्छेद-81 में ही संशोधन होगा। 1971 की जनगणना को आधार बनाते हुए साल 1976 में संविधान का 42वां संशोधन हुआ था। जिसमें 2001 तक परिसीमन को स्थगित कर दिया गया था। इसके बाद 84वें संविधान संशोधन, 2001 के द्वारा परिसीमन पर रोक की समयसीमा को बढ़ाकर 2026 कर दिया गया था। सरकार के पास क्या है उपाय: अगर कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी की बात सही है तो सरकार को सबसे पहले संसद में दो तिमाही बहुमत के साथ संविधान में संशोधन कर परिसीमन पर लगी रोक को हटाना पड़ेगा। इसके अलावा उन्हें साल 2001 या फिर 2011 की जनसंख्या को आधार बनाना होगा। इसी के बाद परिसीमन आयोग का गठन हो सकता है।