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कोरोना काल में भी सेविकाओं द्वारा शिशुओं को कराया गया अन्नप्राशन

कोरोना काल में भी सेविकाओं द्वारा शिशुओं को कराया गया अन्नप्राशन

  • बच्चों के बेहतर शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए सही पोषण जरूरी
  • बाल कुपोषण रोकने में अनुपूरक आहार की अहम भूमिका

पूर्णियाँ। कोरोना काल में भी शिशुओं के स्वास्थ्य के लिए विभाग द्वारा बेहतर प्रयास किया जा रहा है. कोरोना संक्रमण के इस दौर में जब हर संस्थान बन्द हैं फिर भी आंगनवाड़ी सेविकाएँ अपनी भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तत्तपर है. प्रतिमाह की तरह इस माह भी सेविकाओं द्वारा अपने पोषक क्षेत्र में घर-घर जाकर 6 माह से ऊपर के बच्चों का अन्नप्राशन करवाया गया. इस दौरान घर पर बच्चों का कैसे ख्याल रखें, जिससे वह संक्रमण के साथ-साथ अन्य बीमारियों से भी बचे रह सके, इन सबकी भी जानकारी दी गई.

अनुपूरक आहार है कुपोषण दूर करने का बेहतर जरिया :
पूर्णियाँ सदर सीडीपीओ राजेश रंजन ने बताया बाल कुपोषण को कम करने में अनुपूरक आहार की अहम भूमिका होती है. छह माह तक शिशु का वजन लगभग दो गुना बढ़ जाता है एवं एक वर्ष पूरा होने तक वजन लगभग तीन गुना एवं लम्बाई जन्म से लगभग डेढ़ गुना बढ़ जाती है. जीवन के दो वर्षों में तंत्रिका प्रणाली एवं मस्तिष्क विकास के साथ सभी अंगों में संरचनात्मक एवं कार्यात्मक दृष्टिकोण से बहुत तेजी से विकास होता है. इसके लिए अतिरिक्त पोषक आहार की जरूरत होती है. इसलिए 6 माह के बाद शिशुओं के लिए स्तनपान के साथ अनुपूरक आहार की जरूरत होती है.

अन्नप्रासन के जरिए अनुपूरक आहार पर बल:

6 माह के बाद स्तनपान के साथ अनुपूरक आहार की जरूरत होती है. इस दौरान शिशु के शरीर एवं मस्तिष्क का तेजी से विकास होता है. इसे ध्यान में रखते हुए सभी आंगनबाड़ी केन्द्रों पर माह में एक बार अन्नाप्रसन दिवस आयोजित किया जाता है. इस मौके पर 6 माह के शिशुओं को अनुपूरक आहार खिलाया जाता है. साथ ही उनके माता-पिता को इसके विषय में जानकारी दी जाती है. पर चूंकि अभी हर तरफ संक्रमण का खतरा बढ़ता जा रहा है और लोगों को घरों से निकलने से मना किया गया है इसलिए आंगनवाड़ी सेविकाएँ घर-घर जाकर बच्चों को अन्नप्राशन करवा रही हैं, जिससे कि आने वाले समय में बच्चों में किसी तरह की कुपोषण की शिकायत न उत्पन्न हो.

शिशुओं के लिए इन आहारों का करें इस्तेमाल :

राजेश रंजन ने बताया शिशु के लिए प्रारंभिक आहार तैयार करने के लिए घर में मौजूद मुख्य खाद्य पदार्थों का उपयोग किया जा सकता है. सूजी, गेहूं का आटा, चावल, रागा, बाजरा आदि की सहायता से पानी या दूध में दलिया बनाया जा सकता है. बच्चे की आहार में चीनी अथवा गुड को भी शामिल करना चाहिए क्योंकि उन्हें अधिक ऊर्जा की जरूरत होती है. 6 से 9 माह तक के बच्चों को गाढे एवं सुपाच्य दलिया खिलाना चाहिए. वसा की आपूर्ति के लिए आहार में छोटा चम्मच घी या तेल डालना चाहिये. दलिया के अलावा अंडा, मछली, फलों एवं सब्जियों जैसे संरक्षक आहार शिशुओं के विकास में सहायक होते हैं.

आंकड़ों के अनुसार :
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-4 के अनुसार पूर्णियाँ जिले में 6 माह से 8 माह तक सिर्फ 18.6 प्रतिशत बच्चे है जिन्हें स्तनपान के साथ पर्याप्त आहार प्राप्त होता है. वहीँ 6 माह से 23 माह के बीच कुल केवल 11.7 प्रतिशत बच्चे हैं जिन्हें पर्याप्त आहार प्राप्त होता है.

अनुपूरक आहार के साथ ही इन बातों का रखें ध्यान :
• 6 माह बाद स्तनपान के साथ अनुपूरक आहार शिशु को दें
• स्तनपान के अतिरिक्त दिन में 5 से 6 बार शिशु को सुपाच्य खाना दें
• शिशु को मल्टिंग आहार(अंकुरित साबुत आनाज या दाल को सुखाने के बाद पीसकर) दें
• माल्टिंग से तैयार आहार से शिशुओं को अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है
• शिशु यदि अनुपूरक आहार नहीं खाए तब भी थोडा-थोडा करके कई बार खिलाएं